श्री वृंदावन बिहारी शर्मा (88) वृंदावन (मथुरा) स्थित करीब 100 वर्ष पुराने मंदिर ‘निम्बार्क कोट’ के सेवायत हैं। इन्होंने ब्रज के समाज गायन, रासलीला और ब्रज के हस्तलिखित साहित्य के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। वृंदावन बिहारी जी 14-15 वर्ष की आयु से ही मंदिर का कामकाज संभाल रहे हैं। यह मंदिर वृंदावन में निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव के आयोजन के लिए विख्यात है जो कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) में पूरे महीने मनाया जाता है। यह महोत्सव 182 वर्ष (सन् 1843) से अधिक वर्षों से वृंदावन में आयोजित होता है। इस महोत्सव की विशेषता है इसमें दैनिक होने वाला समाज गायन और नित्य रासलीला। समाज गायन ब्रज के भक्त कवियों की पद रचनाओं का शास्त्रीय व लोक शैली में सामूहिक गायन है। नित्य रासलीला ब्रज के भक्तों की रचित श्रीकृष्ण की किशोर लीलाएं हैं, इन लीलाओं का मंचन अब केवल निम्बार्क कोट में ही होता है। समाज गायन व नित्य रासलीला ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर है, इस महोत्सव के आयोजन के जरिए इनका संरक्षण हो रहा है। समाज गायन सदियों से ब्रज के मंदिरों में होता है, ब्रज में मौजूद सभी वैष्णव संप्रदायों की अपनी शैलियां हैं लेकिन निम्बार्क संप्रदाय के समाज गायन ने सभी शैलियों में एक विशेष दर्जा हासिल किया है तो यह केवल वृंदावन बिहारी जी का निजी प्रयास है। उन्होंंने अपने पैतृक मंदिर में एक मासीय निम्बार्क जयंती आयोजन में हर दिन न सिर्फ समाज गायन में कौन-सा पद, किस राग व शैली में गाया जाए, बल्कि रास लीलाओं के क्रम को भी तय किया ताकि प्राचीन शैली व परंपरा ही बरकरार रहे। वे स्वयं समाज गायन के अच्छे गायक और समाज गायन के साधु-संतों की टोली के मुखिया हैं। आज भी दो घंटे तक गाए जाने वाले लंबे पदों को ठाकुरजी के सामने गाते हैं। उनकी गायन शैली इतनी असरदार है कि समाज गायन से अनजान व्यक्ति भी उसे सुनकर बिना किसी योगक्रिया के एकाग्रचित्त व शांत मन:स्थिति में पहुुंच जाए। उन्होंने उत्सव के दौरान उन नित्य रासलीलाओं के मंचन को प्रोत्साहित किया जिनका मंचन अब ब्रज में भी कहीं नहीं होता है। विशेष बात यह है कि इसके लिए उन्होंने किसी सरकारी या निजी संस्था से कभी मदद नहीं ली बल्कि स्वयं श्रीमद्भागवत के कथावाचन के परिश्रम से धन एकत्र कर सभी संचालन किया। उन्हें संस्कृत में आचार्य और दर्शनशास्त्र में एमए की उपाधि हासिल है।
ब्रज के संतों, विद्वानों का उन्हें विशेष स्नेह मिला। पिता श्रृंगारी जी तब परमधाम चले गए जब इनकी उम्र महज 13 साल थी। महज 10 दिन की आयु में ही बाबा हंसदास जी इन्हें गोद में रखकर कंठी बांधी। बाबा बालगोविंद दास जी से आपने निम्बार्क संप्रदाय की दीक्षा ली। टटिया स्थान के बाबा श्री राधा चरण दास जी महाराज ने इन्हें सदा पुत्रवत दुलार दिया। भागवत के मर्मज्ञ व शालीन वक्ता पं. रामानुचार्य जी (सेवा कुंज की गली में) से उन्होंने भागवत कथा की शिक्षा ली। अपने गुरुदेव व परमगुरुदेव की भांति ही निम्बार्क निष्ठ होते हुए भी इनकी सभी संप्रदायों व उनके आचार्य, महात्माओं के प्रति अपार आस्था व सम्मान है। इनके सरल, सहज, निश्छल, निर्मल, निस्पृह व उदार स्वभाव के चलते निम्बार्क कोट में न केवल निम्बार्की बल्कि हरिदासी, गौड़िया, रामानंदी, रामानुजी, राधा बल्लभी और बल्लभकुली सभी संप्रदायों के साधु-संतों, महात्माओं, महंतों व विद्वानों का अपने घर-मंदिर के तरह आना-जाना बना रहता हैं।
70 के दशक में वृंदावन में ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण के लिए शोध संस्थान की स्थापना हुई तो इन्होंने उसमें कैटलॉग तैयार करने की जिम्मेदारी ली ताकि उन्हें ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों को पढ़ने का मौका मिलता रहे। सामान्य कैटलॉगिंग से कहीं बढ़कर इन्होंने अनेक विशिष्ट मानक तय करके ग्रंथों की संक्षिप्त विवरण तैयार किया। यह ग्रंथ ब्रज, संस्कृत, हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी व उर्दू आदि भाषाओं में हैं। इन्होंने वृंदावन के तमाम मंदिरों को भी इस बात सहमत कराया कि उनके पास जो भी हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं उन्हें वृंदावन शोध संस्थान में दान कर दें ताकि वे वहां भविष्य के लिए वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित रह सकें और आने वाली पीढ़ियों को उपलब्ध हों। शोध संस्थान में काम करने के दौरान इन्होंने करीब 25 वर्षों के दौरान हजारों हस्तलिखित ग्रंथों का अध्ययन करके हिंदी व अंग्रेजी में एक दर्जन कैटलॉग तैयार किए जो संस्थान की एक विशेष पूंजी है क्योंकि देश के किसी भी हस्तलिखित संग्रहालय में ऐसा ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, यमुना के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्होंने न केवल बल्लभाचार्य व अन्य संतों की भांति स्वयं का एक यमुनाष्टक लिखा बल्कि अब तक उपलब्ध सभी यमुनाष्टकों का एकत्र करके और यमुना पर विस्तार से शोधपरक पुस्तक ‘यमुना एवं यमुनाष्टक’ लिखी है। इसमें यमुना के प्रदूषण दूर करने के लिए इसकी अविरल निर्मल धारा को बनाए रखने की सरकार से अपील की है। दिल्ली व आगरा के विश्वविद्यालयों से लेकर वृंदावन व आसपास के इलाकों के हिंदी, संस्कृत, ब्रज भाषा व दर्शनशास्त्र पीएचडी शोधार्थी इनके पास मार्गदर्शन के लिए आते रहते हैं। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, आष्ट्रेलिया व तमाम एशियाई देशों के विदेशी जिज्ञासु पर्यटक भी इनके पास अपने प्रश्नों के समाधान के लिए मिलने आते रहते हैं। वृंदावन की विद्वत गोष्ठियों-सम्मेलनों में इन्हें विशेष रूप से भाषण के लिए आमंत्रित किया जाता है, हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश व अन्य कई भाषाओं में समान पकड़ होने के चलते उद्धरण व आख्यानो से भरमार इनका प्रभावशाली धाराप्रवाह भाषण इनकी विशिष्ट पहचान है। इन्हें ब्रज के अनेक सम्मानों व उपाधियों से नवाजा गया है। अपनी बेहद सादी वेशभूषा (धोती-बगलबंदी) व सत्यनिष्ठ, मृदु, विनम्र, करुणामयी, किसी की भी मदद के लिए सदैव तैयार वयोवृद्ध वृंदावन बिहारी जी ब्रज की विभूति व निधि हैं।
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Mera sadar naman
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