सोमवार, 10 अगस्त 2026

निम्बार्क कोट का विकिपीडिया पर उपलब्ध विवरण

निम्बार्क कोट

निम्बार्क कोट उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में स्थित निम्बार्क सम्प्रदाय का एक प्रमुख मंदिर है। यद्यपि आकार में यह एक सामान्य इमारत जैसा है, लेकिन वृन्दावन की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इसका एक विशिष्ट स्थान है। 'निम्बार्क कोट' शब्द में 'निम्बार्क' संप्रदाय के मुख्य आचार्य को दर्शाता है, जबकि 'कोट' का अर्थ किला या वह स्थान है जहाँ आचार्य विराजमान हों।

यह मंदिर विशेष रूप से 'निम्बार्क जयन्ती' के अवसर पर आयोजित होने वाले एक मासीय समारोह के लिए जाना जाता है, जो यहाँ सन् 1924 से मनाया जा रहा है।[1][2] सन् 1923 तक यह उत्सव प्रेम गली स्थित 'उत्सव कुंज' में मनाया जाता था। वर्ष 2025 में इस उत्सव का 182वाँ आयोजन किया गया। इस उत्सव का एक प्रमुख आकर्षण वैष्णव संगीत शैली का 'समाज गायन' है।

निम्बार्क सम्प्रदाय, वैष्णव धर्म के चार प्रमुख सम्प्रदायों में से एक है, जिसे 'सनकादिक' या 'कुमार सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। वैष्णव वे हैं जो विष्णु या उनके अवतारों (विशेषकर राम और कृष्ण) की अपने इष्ट के रूप में उपासना करते हैं। (अन्य तीन प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय हैं: श्री सम्प्रदाय, ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय, और रुद्र या विष्णुस्वामी सम्प्रदाय)।

ब्रज की परंपरा में निम्बार्क संप्रदाय के तीन प्रमुख आचार्य माने जाते हैं: आद्याचार्य (हंस एवं सनकादिक), प्रवर्तकाचार्य (निम्बार्क) और रसिकोपासनाचार्य (हरिव्यास देवाचार्य)। निम्बार्क संप्रदाय में 12 'द्वारे' (शाखाएँ) हैं, जिनमें से निम्बार्क कोट मंदिर 'स्वयंभूराम देवाचार्य द्वारे' की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। हरिव्यास देवाचार्य के 12 प्रमुख शिष्यों में स्वयंभूराम देवाचार्य सबसे वरिष्ठ माने जाते हैं। संप्रदाय की मुख्य पीठ राजस्थान के किशनगढ़ स्थित सलेमाबाद (निम्बार्क तीर्थ) में है।

स्वयं निम्बार्काचार्य राधा सर्वेश्वर शरण देवाचार्य (श्रीजी महाराज) निम्बार्क कोट तीन बार आए थे। अपने एक प्रवास के दौरान उन्होंने उल्लेख किया था कि उन्होंने पुराना बजाजा के ऋषि बाल्मीकि स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी और वे अक्सर निम्बार्क कोट के प्रांगण में खेला करते थे। सुदामा कुटी की स्थापना करने वाले बाबा सुदामा दास जब रामानंदाचार्य जयंती के लिए मधुकरी (भिक्षा) लेने आते थे, तो वे विश्राम के लिए निम्बार्क कोट के जगमोहन में ही रुकते थे।

गीता के मर्मज्ञ संत स्वामी रामसुखदास अपने प्रवचनों में उल्लेख किया करते थे कि यदि वे एकादशी के दिन वृंदावन में होते, तो मधुकरी के लिए निम्बार्क कोट ही जाते क्योंकि वहाँ फलाहारी मधुकरी उपलब्ध होती थी। मंदिर प्रशासन के अनुसार, यहाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा उपयोग किया गया एक ऐतिहासिक लोटा भी संरक्षित है, जिसमें संतों का चरणामृत रखा जाता है, जिसकी श्रद्धालुओं में अपार महिमा है।[3] वर्तमान निम्बार्काचार्य श्यामा शरण देवाचार्य भी निम्बार्क कोट पधार चुके हैं।

2025 की अक्षय तृतीया (29 अप्रैल) से 2026 की अक्षय तृतीया (20 अप्रैल) तक निम्बार्क कोट में एक वर्ष का शताब्दी वर्ष महोत्सव मनाया गया। हर महीने एक भागवत कथा हुई, वर्ष भर के दौरान भागवत के 100 मूल पाठ हुए, 50 दिन समाज गायन हुआ, रासलीला हुई, 21 भंडारे हुए, शोभायात्रा निकली, फूल बंगला बना, भगवान के श्रीविग्रह का सर्वांग अभिषेक दर्शन हुआ जिसमें वृंदावन के संतों, महंतों व ब्रजवासियों ने हिस्सा लिया।[4]

नोट: निम्बार्क कोट नाम का एक अन्य मंदिर अजमेर (राजस्थान) में पृथ्वीराज रोड पर भी स्थित है। वृंदावन के इतिहास में 'हरि' नाम वाले तीन प्रमुख आचार्य हुए हैं, जिन्हें 'हरित्रयी' कहा जाता है—स्वामी हरिदास (बांके बिहारी के प्राकट्यकर्ता), हित हरिवंश (राधाबल्लभ के प्राकट्यकर्ता) और हरिराम व्यास (जुगल किशोर के प्राकट्यकर्ता)।

ब्रज के साहित्य में निम्बार्क कोट

सन् 1968 में प्रकाशित प्रभुदयाल मीतल की पुस्तक ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास (पृष्ठ 550) में निम्बार्क कोट का उल्लेख करते हुए लिखा गया है: "निम्बार्क कोट—यह देवस्थल वृंदावन की छीपी गली में है। इसका निर्माण आचार्य स्वयंभूराम जी की शिष्य परंपरा के बालगोविंद दास जी ने कराया था। उन्होंने सर्वप्रथम आचार्य पंचायतन की स्थापना वृंदावन में की थी। यहाँ निम्बार्कोत्सव बड़े समारोह पूर्वक होता है।"[5][6]

इसी पुस्तक के पृष्ठ 539 व 540 पर गोपाल दास, हंसदास और बालगोविंद दास का परिचय दिया गया है:

  • गोपालदास ‘उत्सवी’: इनका जन्म संवत 1872 (कुछ स्रोतों में 1868) के आसपास एक गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चार धाम की यात्रा के बाद वे कामवन के गोपाल मंदिर में रहे और बाद में वृंदावन आ गए। उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय के आचार्यों की जयंती मनाना और बड़े स्तर पर रास और भागवत-कथा का आयोजन प्रारंभ किया। उनके शिष्यों में हंसदास और ब्रह्मचारी राधेश्याम प्रमुख थे। संवत 1952 में उनका निधन हुआ। गोपालदास भक्तमाल की कथा अत्यंत सरसता से करते थे। भक्तमाल की कथा की जो वर्तमान शैली है, उसका सूत्रपात इन्होंने ही किया था।
  • हंसदास: संवत 1916 में लखनऊ के काकोरी में जन्मे हंसदास, महात्मा गोपालदास के शिष्य थे। वे भागवत के प्रसिद्ध वक्ता थे। सन् 1937 में वृंदावन के निम्बार्क कोट परिसर में उनका देहावसान हुआ।[7] उन्होंने 'सिद्धांत रत्नांजलि', 'कृष्ण सिद्धांत सार', 'राधा रहस्य प्रकाशिका',[8] 'निम्बार्क प्रभा',[9] और 'गोदनावारी लीला' जैसे ग्रंथ लिखे। 'गोदनावारी लीला' निम्बार्क कोट के सालाना महोत्सव में अनिवार्य रूप से प्रदर्शित होती है। उन्होंने केशव काश्मीरी भट्‌ट देवाचार्य का उत्सव भी शुरू किया।
  • बालगोविंददास: ये हंसदास के विरक्त शिष्य थे। उन्होंने ही वृंदावन की नाज मंडी में मंदिर बनवाकर आचार्य पंचायतन की प्रतिष्ठा की और निम्बार्क कोट का निर्माण कराया था।[10] उनके द्वारा कथा-कीर्तन और उत्सव नियमित रूप से किए जाते थे।

सन् 1940 में प्रकाशित पुस्तक निम्बार्क माधुरी में बाबा गोपालदास जी और बाबा हंसदास जी महाराज के बारे में कथाएं वर्णित हैं । [11]

सन् 1981 में अवध बिहारी लाल कपूर द्वारा लिखित पुस्तक ब्रज के भक्त (भाग-2, पृष्ठ 13 व 86) में भी इन संतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।[12]

सन् 1986 में श्रीजी मंदिर की पत्रिका श्रीसर्वेश्वर के वृंदावनांक (ब्रजबल्लभ शरण और प्रो. गोविंद शर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित) के पेज-349-350 पर गोपालदास जी, हंसदास जी और बालगोविंद दास जी की कथा है, फिर पेज-401 पर निम्बार्क कोट मंदिर और पेज-414 पर निम्बार्क जयंती उत्सव का उल्लेख है।

1992 में दिल्ली के अभिनव प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘कृष्ण द लिविंग गॉड ऑफ ब्रज’ (लेखक- डी. आनंद) में पेज-108-109 पर ब्रॉडस्प्रेड में मंदिर के गर्भगृह का चित्र विवरण के साथ प्रकाशित हुआ। [13]

इस मंदिर की परंपराओं पर अमर उजाला (2014), दैनिक जागरण (2014) और इंडिया टुडे (2015) में भी लेख प्रकाशित हो चुके हैं।[14] 2016 की नोटबंदी के दौरान इस उत्सव पर पड़े प्रभाव को 'इंडियन एक्सप्रेस' ने भी कवर किया था।[15]

मंदिर का विवरण

राधारमण लालजी

मंदिर के गर्भगृह के मध्य सिंहासन पर श्रीराधारमणलालजी का विग्रह विराजमान है। युगल सरकार के दोनों ओर निम्बार्क आचार्य पंचायतन स्थित हैं। दाहिनी ओर आद्य आचार्य हंस भगवान, उनके मानस पुत्र (सनक, सनंदन, सनातन व सनतकुमार) और शिष्य नारद जी की प्रतिमाएँ हैं। बाईं ओर निम्बार्क भगवान व उनके शिष्य निवासाचार्य प्रतिष्ठित हैं।

निम्बार्क कोट मंदिर का आंगन

गर्भगृह के आगे जगमोहन और एक खुला प्रांगण है, जिनका फर्श काले-सफेद संगमरमर का बना है। जगमोहन में मंदिर के संस्थापक बाल गोविंद दास व उनके छोटे भाई हरिदास श्रृंगारी के चित्रपट स्थापित हैं। गर्भगृह के बाहर चरणपादुकाएं बनी हैं, जहाँ गोपालदास और हंसदास के चित्र हैं। मंदिर में कई प्राचीन चित्र भी मौजूद हैं, जिनमें निम्बार्क भगवान का सर्वेश्वर भगवान की आराधना करते हुए रंगीन चित्र विशेष है। गर्भगृह में राधारमण लाल जी के ठीक पीछे दो सौ साल पुरानी चित्र श्रृंखलाएं हैं, जिनमें निम्बार्क भगवान के विभिन्न रूपों का चित्रण है।

निम्बार्क कोट का आंगन

वास्तुशिल्प की दृष्टि से गर्भगृह में सिंहासन, दीवारें व फर्श संगमरमर के हैं। जगमोहन में इटेलियन टाइल्स का प्रयोग हुआ है। प्रांगण के तीनों ओर बरामदे हैं और राजस्थानी पत्थर के नक्काशीदार खंभे लगे हैं। पश्चिमी ओर एक अतिरिक्त प्रांगण है जहाँ मंदिर का रसोईघर स्थित है।

विशेष: वृंदावन के तीन प्रमुख मंदिरों में राधारमण लालजी विराजमान हैं—सप्तदेवालयों में से एक राधारमण मंदिर, शाहजी मंदिर, और निम्बार्क कोट।

मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव

श्री निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव

यह मंदिर का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव है, जो कार्तिक कृष्ण पंचमी से मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण पंचमी तक पूरे एक महीने चलता है। इस दौरान संप्रदाय के कई प्रमुख आचार्यों की जयंती मनाई जाती है: बालगोविंद दास की जयंती (कार्तिक कृष्ण पंचमी), महावाणीकार हरिव्यास देवाचार्य जयंती (कार्तिक कृष्ण द्वादशी), स्वयंभूराम देवाचार्य जयंती (कार्तिक शुक्ल अष्टमी), हंस भगवान व सनकादिक भगवान जयंती (अक्षय नवमी), माधव भट्‌टाचार्य जयंती (देवउठनी एकादशी), और निम्बार्क भगवान की जयंती (पूर्णिमा)।

इस उत्सव में दीपावली, अन्नकूट और गोपाष्टमी जैसे पर्व भी शामिल होते हैं। प्रतिदिन शाम को आचार्यों की चरित्र कथा होती है, समाज गायन किया जाता है और नित्य रासलीलाएं आयोजित होती हैं। पूर्णिमा के दिन निम्बार्क भगवान का पंचामृत अभिषेक होता है और एक विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है।

हर दिन मंदिर के जगमोहन में एक सिंहासन पर गोपालदास के सेव्य गोपालजी (जिन्हें महंतजी पुकारा जाता है) और निम्बार्क भगवान के चित्रपट विराजमान होते हैं。[16] समाज गायन में 'चलसखी', 'सहज सुख सजनी', 'हेली' जैसे पद गाए जाते हैं और अंत में "सेवों श्री राधारमण उदार" तथा "जय जय श्री राधारमण विराजैं" का गायन होता है। रासलीला में सबसे विशेष 'गोदनावारी लीला' है। भंडारे में द्वादशी को बूंदी, नवमी को मोहनथार, एकादशी को समा की खीर और निम्बार्क भगवान के छठी उत्सव में लड्डू का भोग लगता है। भंडारे की विशेष 'गड्‌ड सब्जी' (मिली-जुली) और लड्डू स्थानीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध हैं।[17]

कार्तिक उत्सव की रासलीलाओं का क्रम

  • कार्तिक कृष्ण द्वादशी (धनतेरस): वंशी चोरी लीला
  • कार्तिक कृष्ण चौदस: केवट लीला
  • कार्तिक अमावस (दीपावली): चौसर लीला[18]
  • कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा: मूदरी चोरी लीला
  • कार्तिक शुक्ल द्वितीया: पनघट लीला
  • कार्तिक शुक्ल तृतीया: ब्रह्मचारी लीला
  • कार्तिक शुक्ल चतुर्थी: विदुषी लीला
  • कार्तिक शुक्ल पंचमी: शंकर लीला
  • कार्तिक शुक्ल छठी: पांडे लीला
  • कार्तिक शुक्ल सप्तमी: राधा प्राकटय लीला
  • कार्तिक शुक्ल अष्टमी (गोपाष्टमी): गोचारण लीला
  • कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी): जोगन लीला
  • कार्तिक शुक्ल दशमी: श्याम सगाई लीला
  • कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी): वरुण लीला
  • कार्तिक शुक्ल द्वादशी: मान लीला
  • कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी: माखन चोरी लीला
  • कार्तिक शुक्ल चर्तुदशी: गोदनावारी लीला
  • कार्तिक पूर्णिमा: सहज सुख के साथ केवल स्वरूप दर्शन
  • अग्रहायण कृष्ण प्रतिपदा: शोभायात्रा
  • अग्रहायण कृष्ण द्वितीया: राजदान लीला

किसी वर्ष तिथि बढ़ने पर चंद खिलौना, मणि खंभ और सुदामा लीला भी की जाती हैं। पिछले 30 वर्ष से स्वामी अमीचंद शर्मा की मंडली रासलीला करती है। अतीत में दामोदरजी, उदय राम, कन्हैयालाल, शिवदयाल-गिर्राज की मंडलियों ने भी यहाँ रासलीलाएं की हैं।[19]

भंडारे में कीर्तन व जयकारे

बड़े भंडारे के दिन जब ठाकुरजी को भोग लगता है तब समाजी मंदिर में भोग के पद गाते हैं (जैसे 'भोजन कुंज में आए दोउ')। पंगत बैठने और परोसगारी के दौरान साधु-संतों द्वारा निम्नलिखित कीर्तन किए जाते हैं:

सीता राम सीता राम सीता राम जय सियावर राम। राधे श्याम राधे श्याम राधे श्याम जय श्यामा श्याम।
सिया हरिनारायण गोविंदे, भज रामा कृष्ण गोविंदे। बोलो संतो हरि हरि, मुख पर मुरली अधर धरी।
गोविंद गोविंद गाओगे, प्रेम पदारथ पाओगे। गोविंद नाम बिसारोगे, जीती बाजी हारोगे।
राम राम भज बारंबारा, चक्र सुदर्शन है रखवारा।
जय जय गोपी जय जय ग्वाल, जय जय सदा बिहारी लाल। गले में तुलसी, मुख में राम, हृदय विराजत शालिगराम।

जब पंगत पर पूर्ण भोजन आ जाता है, तब एक विस्तृत जयकारा लगाया जाता है:

राम कृष्णदेव की जय, राधासर्वेश्वर की जय, राधामाधव की जय, राधा रमण लालजी की जय, आनंद मनोहर की जय, रूप मनोहर की जय, वृंदावनचंद्र की जय, गोवर्धन चंद्र की जय, गोविंद देव की जय, मदनमोहन की जय, गोपीनाथ की जय, गोकुल चंद्रमा की जय, बांके बिहारी लाल की जय, वृंदावन बिहारी लाल की जय, राधाबल्लभ लाल की जय, जुगल किशोर की जय, रसिक बिहारी की जय, बिहारी बिहारिन की जय, कुंज बिहारी लाल की जय, गिरिराज धरण की जय, राधा श्याम सुंदर की जय, राधा दामोदर की जय, लाड़ली लाल की जय, रास बिहारी लाल की जय, यशोदा नंदन की जय, नंद नंदन की जय, नंदगांव बरसाना की जय, विलासगढ़ की जय, नीम गांव की जय, मानसी गंगा की जय, वृंदावन धाम की जय, मधुपुरी अवधपुरी की जय, काशी प्रयाग की जय, गंगा-जमुना की जय, चारों धाम की जय, चार संप्रदाय की जय, हंस भगवान की जय, सनकादिक भगवान की जय, नारद भगवान की जय, निम्बार्क भगवान की जय, निवासाचार्य की जय, द्वादश आचार्यन की जय (विश्वाचार्य, पुरुषोत्तामाचार्य, विलासाचार्य, स्वरूपाचार्य, माधवाचार्य, बलभद्राचार्य, पद्माचार्य, श्यामाचार्य, गोपालाचार्य, कृपाचार्य, देवाचार्य), अष्टादश भट्‌ट आचार्यन की जय (सुंदर भट्ट, पद्मनाभ भट्ट, उपेंद्र भट्ट, रामचंद्र भट्ट, वामन भट्ट, कृष्णभट्ट, पद्माकर भट्ट, वाण भट्ट, भूरि भट्ट, माधव भट्ट, श्याम भट्ट, गोपाल भट्ट, बलभद्र भट्ट, गोपीनाथ भट्ट, केशव भट्ट, गांगल भट्ट, केशव कश्मीरी भट्ट, श्रीभट्ट, हरिव्यास देवाचार्य, स्वयंभूराम देवाचार्य, कर्णहर देव, नारायण देव, हरिदेव, श्याम देव, श्याम दामोदर देव, श्रुति देव, सहजराम देव, रामदेव, ज्ञानदेव, वृंदावन देव, रामशरण देव, धर्म देव, सेवादास जी), महंत गोपाल दास जी की जय, बाबा हंसदास जी की जय, बाबा बालगोविंद दास जी की जय, श्रृंगारी जी की जय, मैया जी श्यामप्यारी की जय, भैया बांके बिहारी की जय, अनंत कोटि वैष्णवन की जय, स्थान पुरुष की जय, रसोइया पुजारी की जय, कोठारी भंडारी की जय, सब सती सेवकन की जय, उनके माता पिता की जय, उनके बाल गोपाल की जय, उनके समस्त परिकर की जय, अपने-अपने गुरु गोविंद की जय।

अंत में सभी एक साथ दोहा पढ़ते हैं:

बोलना हरे...राम कहें सुख ऊपजे, कृष्ण कहें दुःख जाय। महिमा महाप्रसाद की, पावो प्रीति लगाय।

पंगत के मध्य और अंत में "जय जय श्री राधे श्याम" का जयकारा लगाया जाता है।[20]

शोभायात्रा

निम्बार्क कोट की शोभायात्रा विगत 180 वर्षों से निकलने वाली वृंदावन की सबसे पुरानी शोभायात्राओं में से एक है। इसमें मुख्यरूप से दो डोले होते हैं: एक रासबिहारी के स्वरूप का और दूसरा गोपालजी व निम्बार्क भगवान के चित्रपट का। शोभायात्रा में वृंदावन के सभी अखाड़ों के निशान, कीर्तन मंडली, बैंडबाजे और ताशे शामिल होते हैं। यह छीपी गली से शुरू होकर किशोरपुरा, बिहारीजी, अठखंभा, लोई बाजार, निधिवन, केशीघाट, वंशीवट होते हुए सुदामाकुटी पहुँचती है और फिर ज्ञानगूदड़ी, गोपीनाथ बाजार, चुंगी चौराहा और बाजाजा होते हुए वापस मंदिर लौटती है। इस यात्रा में करीब 6 घंटे लगते हैं।

अन्य उत्सव

मंदिर में नारद जयंती, निवासाचार्य जयंती (बसंत पंचमी), केशवकाश्मीरी भट्‌टदेवाचार्य जयंती, हंसदास जी जयंती, होली, रामनवमी, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, हरिदास श्रृंगारी जी जयंती, गुरु पूर्णिमा, सावन झूला उत्सव, शरदोत्सव और अक्षय तृतीया का पाटोत्सव भी विशेष रूप से मनाया जाता है। मंदिर में नियमित रूप से गोपाल सहस्रनाम, विष्णु सहस्रनाम, महावाणी, युगल शतक, रामचरित मानस व वाल्मीकि रामायण का पाठ तथा श्रीमद्भागवत व भक्तमाल की कथाएँ आयोजित होती हैं।

वार्षिक उत्सव कलैंडर

तिथिउत्सव
चैत्र शुक्ल प्रतिपदासंवत्सर (नव वर्ष)
चैत्र शुक्ल नवमीरामनवमी
वैशाख शुक्ल तृतीयाअक्षय तृतीया (श्री राधारमणलालजी का पाटोत्सव)
वैशाख शुक्ल चतुर्दशीनृसिंह जयंती चतुर्दशी उत्सव
ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थीश्रीकेशव काश्मीरी भट्‌टाचार्य पाटोत्सव
आषाढ़ कृष्ण तीजश्री हंसदास जी का निकुंज प्राप्ति उत्सव
आषाढ़ पूर्णिमागुरु पूर्णिमा उत्सव
श्रावण शुक्ल तीजहरियाली तीज
श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमाझूला उत्सव
भाद्रपद कृष्ण अष्टमीठाकुरजी का जन्मोत्सव
भाद्रपद कृष्ण नवमीनंदोत्सव
भाद्रपद शुक्ल अष्टमीश्रीजी (राधा) का जन्मोत्सव
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीअनंत चतुर्दशी (गुरु महाराज जी का निकुंज प्राप्ति उत्सव)
आश्विन कृष्ण त्रयोदशीमैयाजी का निकुंज प्राप्ति उत्सव
आश्विन पूर्णिमाशरद पूर्णिमा
कार्तिक कृष्ण पंचमीगुरु महाराज जयंती, निम्बार्क महोत्सव का शुभारंभ
कार्तिक कृष्ण द्वादशीश्रीहरिव्यास देवाचार्य जयंती (कथा, समाज व रासलीला आरंभ)
कार्तिक अमावस्यादीपावली उत्सव
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदागोवर्धन पूजा, अन्नकूट
कार्तिक शुक्ल अष्टमीगोपाष्टमी, स्वयंभूराम देवाचार्य जयंती
कार्तिक शुक्ल नवमीअक्षय नवमी (हंस व सनकादिक भगवान जयंती)
कार्तिक पूर्णिमानिम्बार्क भगवान जयंती
मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण प्रतिपदानिम्बार्क भगवान की शोभायात्रा
मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमीछठी उत्सव, वैष्णव साधु सेवा बड़ा भंडारा
मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशीनारद भगवान जयंती
पौष पूर्णिमाश्रृंगारीजी का उत्सव
माघ शुक्ल पंचमीवसंत पंचमी, निवासाचार्य जयंती
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमाहोली उत्सव

एकादशी की परिपाटी

निम्बार्क कोट में एकादशी व कोई भी व्रत पर्व निम्बार्की सिद्धांत ‘कपालवेध’ के आधार पर मनाया जाता है। व्रतों में एकादशी को प्रधान व्रत माना जाता है। अक्सर सुना जाता है कि निम्बार्कियों की एकादशी आज नहीं कल है जिस वजह से ऐसा होता है, उसे ही कपालवेध कहते हैं। निम्बार्क संप्रदाय में एकादशी या किसी भी अन्य व्रत-उपवास और भगवान व आचार्यों की जयंतियों के मानने के लिए उदयव्यापिनी तिथि को स्वीकार किया गया है, परंपरा यह है कि जिस तिथि में सूर्योदय होगा, पूरे दिन फिर वही तिथि मानी जाती है, भले ही सूर्योदय के कुछ ही घंटों में वह तिथि समाप्त हो जाए और बाकी दिन दूसरी तिथि रहे। इसीलिए कई बार ऐसा महसूस होता होगा कि किसी ने एकादशी पहले कर ली और निम्बार्कियों की एकादशी अगले दिन पड़ी। एकादशी व्रत रखने के लिए दिन के चयन का निम्बार्कीय तरीका यह है-दिनभर में 60 घटी (घड़ी) होते हैं। यदि दशमी तिथि मध्य रात्रि के बाद 45 घटी तक रहे और उसके बाद एकादशी आए तो उस दिन एकादशी का स्पर्श तो हो जाता है लेकिन ऐसी स्थिति में एकादशी छोड़कर अगले दिन द्वादशी को व्रत करने का विधान शास्त्रों में दिया गया है। इस वेध को स्पर्श वेध कहते हैं। रात्रि के अर्धभाग के वेध को मानने से ही इसका नाम कपालवेध सिद्धांत पड़ा। सौर दिवस में जैसा करीब 24 घंटे की अवधि का दिन होता है, वैसा 24 घंटे का हर दिन चंद्रमास में नहीं होता। चंद्रमास के दिन की अवधि 19 घंटे से लेकर 24 घंटे तक अलग-अलग होती हैं। एक सौरवर्ष 365 दिन और चंद्रवर्ष 354-355 दिन का होता है, 10-10 दिन के इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन वर्ष में एक अधिकमास आता है। सो, किसी एक दिवस में जब एकादशी पूर्व तिथि यानी दशमी से जुड़ी हो तो उसे विद्धा और जब अगली तिथि यानी द्वादशी से जुड़ी हो तो उसे शुद्धा एकादशी कहते हैं। आचार्यों का आदेश है कि विद्धा एकादशी न करके शुद्धा एकादशी का व्रत करना चाहिए। लेकिन कुछ विशेष योग होने पर द्वादशी को महाद्वादशी कहा जाता है तब शुद्धा एकादशी को भी छोड़कर महाद्वादशी का व्रत करना चाहिए। नारद पुराण में ये महाद्वादशी बताई गई है- जिस दिन एकादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाए, दिनभर द्वादशी रहे और रात के अंतिम हिस्से में त्रयोदशी भी आ जाए तो उसे ‘त्रिस्पृशा’ महाद्वादशी कहते हैं। जब एकादशी पूरे दिन रहकर अगले दिन भी कुछ समय के लिए हो तो उसे ‘उन्मीलनी’ महाद्वादशी कहते हैं। जब एकादशी व द्वादशी पूर्ण हो और द्वादशी की वृद्धि अगले दिन तक रहे तो यह ‘वंजुलिनी’ महाद्वादशी कहलाती है। जिस पक्ष में अमावस्या या पूर्णिमा की वृद्धि हो जाए तो वह द्वादशी ‘पक्षवर्धिनी’ महाद्वादशी कहलाती है। जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि मघा नक्षत्र में पड़े तो ‘जया’ महाद्वादशी का नाम दिया जाता है। जब द्वादशी श्रवण-नक्षत्र में हो फिर वह चाहे शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष, वह ‘विजया’ महाद्वादशी कहलाती है। जब शुक्लपक्ष की द्वादशी रोहिणी नक्षत्र में पड़े तो ‘जयंती’ महाद्वादशी और पुष्य नक्षत्र में पड़े तो ‘अपराजिता’ महाद्वादशी कहलाती है। इसके अलावा शुक्लपक्ष की द्वादशी पुनर्वसु नक्षत्र में हो तो उसे ‘पापनाशिनी’ महाद्वादशी कहते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि पर्व यानी पूर्णिमा या अमावस्या, अच्युत यानी द्वादशी, जया यानी त्रयोदशी की वृद्धि हो और ईश यानी अष्टमी, दुर्गा यानी नवमी और अंतक यानी दशमी का क्षय हो तो शुद्धा एकादशी छोड़कर भी द्वादशी का ही व्रत करें। निम्बार्क संप्रदाय में एकादशी व महाद्वादशी के व्रत के अलावा कृष्ण जन्माष्टमी, राम नवमी, महाशिवरात्रि व निम्बार्क जयंती को व्रत रखने का विधान व परंपरा है।

एकादशी का व्रत विधान

एकादशी या किसी व्रत या उपवास का मतलब है कि निराहार रहना लेकिन वैष्णवों की सगुणोपासना में ठाकुरजी की नित्य सेवा की जाती है, जिसमें एकादशी के दिन ठाकुरजी को भोग लगाने में वह अर्पण किया जाता है जो फलाहार श्रेणी में आता है। बिल्कुल निराहार रहने की बाध्यता नहीं है, हालांकि भोजन में अन्न (गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा का आटा, दाल, चावल, सब्जी) नहीं लिया जाता है। फलाहार किया जाता है। केला, सेब, अनार, आम, अमरूद, संतरा, नीबू, अदरख, शकरकंद, आलू, घीया सहित तमाम फल व कंदों का सेवन हो सकता है लेकिन तरबूज, गाजर, पालक, बथुआ, सरसों, मटर, गोभी आदि का सेवन वर्जित बताया गया है। वैष्णवों को प्याज-लहसुन का सेवन तो रोजाना में ही मना है। फलों का रस ले सकते हैं। चाय, कॉफी भी व्रत के दिन छोड़ सकते हैं। दूध, दही, पनीर, खोया, घी लिया जा सकता है। मूंगफली, मखाने, काजू, पिस्ता, बदाम, कूटू व सिंघाड़े का आटा, समा के चावल (सामान्य चावल तो व्रत के एक शाम पहले से लेना मना है), सामान्य नमक के स्थान पर सेंधा नमक, लाल मिर्च के स्थान पर काली मिर्च का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन हल्दी का इस्तेमाल नहीं करना है। धनिया किसी भी रूप में और जीरे का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन हींग, खटाई, गर्ममसाला, राई, सरसों का नहीं। सरसों के तेल का इस्तेमाल भी मना है।


मंदिर की स्थिति

निम्बार्क कोट का दक्षिणी दरवाजा

वृन्दावन में निम्बार्क कोट पहुँचना अत्यंत सुगम है। बनखंडी चौराहे से पूर्व दिशा में जाने वाली गली में दाहिनी ओर पाँचवाँ दरवाजा इसी मंदिर का उत्तरी द्वार है। मंदिर का एक दक्षिणी द्वार पुराना बजाजा में है, जो ऋषि बाल्मीकि स्कूल और सब-स्टेशन नं 3 के ठीक सामने है। नेशनल हाइवे 2 (दिल्ली-आगरा) से छटीकरा मोड होते हुए या यमुना एक्सप्रेसवे से वृंदावन कट के जरिए यहाँ पहुँचा जा सकता है।

मंदिर का पास-पड़ोस और अन्य महत्वपूर्ण देवस्थल

निम्बार्क कोट की लोकेशन वृंदावन में सर्वोत्तम स्थान पर है। यहां से वृंदावन के किसी भी महत्वपूर्ण देवस्थल, मंदिर व दर्शनीय स्थान पर जाने के लिए करीब-करीब एक समान दूरी ही चलनी पड़ती है। वृंदावन में निम्बार्क आचार्य पीठ का प्रमुख स्थान श्रीजी मंदिर जो रेतिया (प्रताप) बाजार में है, इसे बड़ी कुंज और श्रीनिकुंज भी कहते हैं, ये निम्बार्क कोट से 200 मीटर पर है। श्रीजी कुंज से आगे बढ़ें तो शाह बिहारी मंदिर, निधिवन और राधारमण जी मंदिर हैं। यहां से केशी घाट, जुगल किशोर मंदिर और फिर गोपीनाथ जी होते हुए गोपेश्वर महादेव पहुंच सकते हैं। फिर वंशीवट (यहां महाप्रभुजी की बैठक भी है), सुदामा कुटी, खाक चौक होते हुए ज्ञान गूदड़ी जा सकते हैं, यहां टिकारी रानी मंदिर, जगन्नाथ जी मंदिर और तुलसी राम दर्शन स्थल भी है। यहां अखाड़े भी हैं। ज्ञान गूदड़ी से राम बाग होते हुए टटिया स्थान जा सकते हैं। टटिया स्थान से लौटते समय कात्यायनी केश पीठ जा सकते हैं। यहां से रंगजी और फिर ब्रह्म कुंड, लाला बाबू, गोदा विहार और ब्रह्मचारी मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यहां से गोविंद जी मंदिर (वृंदा देवी मंदिर भी इसी परिसर में है) का दर्शन करते हुए सिंहपौर हनुमान व पत्थरपुरा होते हुए गोविंद घाट के पास मीराबाई मंदिर आ सकते हैं, यहां से बाहर निकलने पर रासमंडल होते हुए श्रृंगारवट, फिर राधा दामोदर मंदिर, फिर राधा श्याम सुंदर मंदिर, सवामन शालिग्राम के दर्शन करके रिक्शा सरीखे वाहन से मदन मोहन जी मंदिर और अष्टसखी मंदिर होते हुए सीधे रमणरेती जा सकते हैं, जहां कृष्ण बलराम (इस्कॉन अंग्रेज) मंदिर है। इस्कॉन के पहले दावानल कुंड की ओर आनंद वृंदावन यानी अखंडानंद आश्रम भी जा सकते हैं, साधुबेला (कदंब छाया), हरि निकुंज व हरिमिलाप भी रास्ते में हैं। वृंदावन की परिक्रमा मार्ग से बाहर प्रेम मंदिर, प्रियाकांत जू मंदिर, चंद्रोदय मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर सहित कई नए मंदिर हैं। वहां से वाहन से लौटकर सीधे अटल्ला चुंगी आ सकते हैं, यहां से पागल बाबा मंदिर देख सकते हैं, फिर लौटकर नीम करोली आश्रम है, गोरे दाऊजी, गोलोक धाम जा सकते हैं। यहां से बस अड्‌डे जाने वाली सड़क पर अनेक मंदिर हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है राधा माधव (जयपुर) मंदिर और इसके सामने गली में तराश वाला मंदिर है। आगे बढ़ने पर मुंगेर मंदिर और उसके सामने गुरुकुल मार्ग पर काठियाबाबा आश्रम है। फिर से निम्बार्क कोट के सामने होते हुए बनखंडी महादेव, रसिक बिहारी मंदिर, मोटा गणेश, गंगा मंदिर, सत्यनारायण मंदिर होते हुए बांके बिहारीजी का दर्शन कर सकते हैं। इसी के करीब है राधा बल्लभजी का मंदिर। राधा बल्लभ जी मंदिर से बाहर निकलने सामने भट्‌ट गली में मधु निकुंज है, युगल घाट की तरफ बढ़ने पर यशोदानंदन मंदिर है, फिर टोपीवाली कुंज, यहां से दान-मान गली (रुप-सनातन गौड़िया मठ) होते हुए सेवा कुंज और इमली तला जा सकते हैं। व्यास घेरा में युगल बिहारी मंदिर और सामने प्रेम गली में गोरेलाल जी कुंज होते हुए वापस निम्बार्क कोट आ सकते हैं।

वृंदावन में सभी वैष्णव संप्रदायों के अलावा महादेव, देवी, गणेश के मंदिर हैं, सर्वाधिक निम्बार्क संप्रदाय के हैं, फिर गौड़िया, हरिदासी, राधा बल्लभी, रामानंदी, रामानुजी व बल्लभकुल के हैं।

मंदिर की दिनचर्या और स्तुति

दैनिक रूप से मंदिर में तीन प्रमुख आरतियाँ होती हैं—सुबह मंगला आरती, श्रृंगार आरती और शाम को संध्या आरती। दिन में भोग और रात्रि में शयन के समय धूप आरती होती है। आरतियों में विजय घंट बजाए जाते हैं। श्रृंगार आरती में संक्षिप्त और संध्या आरती में संपूर्ण निम्बार्क स्तुति गाई जाती है। आरती पीतल, तांबे या चांदी की हो सकती है, आरती में घी की भीगी हुई रुई की बाती जलाएं। बाती विषम संख्या यानी 3, 5, 7 या अधिक हो सकती हैं। आरती को बांयीं ओर से शुरू करके दायीं ओर घुमाते हैं यानी घड़ी की दिशा में। बाएं हाथ से गरुड़ घंट बजाते रहते हैं और दाएं हाथ से आरती की जाती है। आरती मंत्रोच्चार के साथ होनी चाहिए और गरुण घंटी बजाकर प्रतीकात्मक रूप से माना जाता है कि मंत्रोच्चार हो रहा है। आरती करते समय सबसे पहले ठाकुर जी के चरणों में 4 बार दीपक घुमाते हैं। फिर उनकी नाभि के सामने 2 बार घुमाते हैं। इसके बाद उनके मुखमंडल के सामने 1 बार घुमाते हैं और अंत में प्रभु के संपूर्ण श्रीअंगों पर 7 बार आरती घुमाएं (इस प्रकार कुल 14 बार दीपक घुमाया जाता है)।

मंदिर की संध्याकालीन आरती की स्तुति

श्री हंस च सनत्कुमारप्रभ्रतीन वीणाधरम नारदं।
निम्बादित्यगुरुं च द्वादश गुरुं श्री निवासादिकान॥

वन्दे सुन्दर भट्ट देशिक मुखान्वस्विंदु संख्या युतान।
श्री व्यासाद्धरिमध्यगा च परितः सर्वान्गुरुन्सादरम॥

हे निम्बार्क दयानिधे गुणनिधे हे भक्त चिंतामने।
हे आचार्य शिरोमने मुनि गणेराम्रग्यपादाम्बुजम॥

हे सृष्टिस्थितिपालनप्रभवन हे नाथ मायाधिपे।
हे गोवर्धन कन्दरालयविभो मां पाहि सर्वेश्वर।

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षः स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वर मौक्तिकं करतले वेणु करे कंकणं॥

सर्वांगे हरीचन्दनं सुललितं कंठे च मक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्ठितो विजयते गोपालचूरामणि॥

फुल्लेंदीवर कान्ति मिंदुवदनं वर्हावतंसन प्रियं।
श्री वत्सांगमुदार कौस्तुभधरं पीताम्बर सुन्दरम॥

गोपीनां नयनोत्पलार्ची त तनुं गोगोपसंघाव्रतम।
गोविन्दं कलवेणु वादनपरं दिव्यांगभुषम भजे॥

हे राधे वृष भानु भूपतनये हे पूर्ण चंद्रानने।
हे कांते कमनीय कोकिलरवे ब्रन्दावनाधीश्वरी॥

हे मत्प्रानपरायने च रसिके हे सर्वयुथेश्वरी।
आगत्य त्वरितं प्रतप्त मणिशं मां दीनमानन्दय॥

हे राधे वृषभानुभूपतनये सर्वेश्वरी राधिके।
हे कृष्णानन पंकजभ्रमरिके कृष्ण प्रिये माधवी॥

हे वृन्दावननागरी गुणगुरो दामोदरप्रेयसी।
हे हे श्री मलललितादिक प्रियसखी प्रनाधिके पाहि माम॥

शिन्जनू पुरपादपदमयुगलामा हंसीं गतिं विभ्रतीम।
चंचतखंजनमंजुलोचनयुगां पोनोल्लसत्कंधराम॥

शोभित कांचनकंकनद्युति मिलतपानौ चलच्चामरम।
कुरवाणाम हिरराधिकोपरि सदा श्री रंगदेवीं भजे॥

श्री रंगादिसुदेविका च ललिता वैशाखिका चम्पिका।
चित्र तंग सुखिंदुलेखकपरा चाष्टो प्रधानाप्रिया॥

चान्या सन्ति प्रियात्प्रिया लघुतमानित्ये च नैमित्तके।
वन्दे त्वच चरणारविन्दनितरां दासा वयं श्रद्धया॥

स्वभावतोपास्तसमस्तदोष मशेष कल्याण गुनेकराशिम।
व्यूहांगिनं ब्रह्म परंवरेण्यम ध्यायेम कृष्णं कमलेक्षण हरिम॥

अंगे तुवामे ब्रिषभानुजा मुदाविराजमानामनुरूपसौभागाम।
सखी सह्त्रै परिसेविताम सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम॥

नान्यागति कृष्णपदारबिन्दात संद्रेश्यते ब्रह्मशिवादिवंदितात।
भक्तेछ्योपत्सुचिन्त्त्यविग्रहादचिन्त्यशक्तेरविचिन्त्यशासनात॥

लोकत्रये यान्यसदीहितानी तान्येव सर्वाणि मया कृतानि।
तदीय पाकावसरम विसोढुमसक्नुवन देवमुपैमी नाथ॥

वशीकृतिं यान्ति न हीन्द्रियानी बुद्धिर्नशुद्धिम समुपैति तस्मात्।
न साधनं मेस्ती तव प्रसादे दयालुभावेन बिना हरे ते॥

न धर्मनिष्ठोस्मी नचात्मवेदी न भक्तित्मा स्त्वच्चारानार्विंदे।
अकिन्चनोनन्यगति शरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

कीर्तन

दोहा
पराभक्ति रति वर्द्धनी, स्याम सब सुख दैनि।
रसिक मुकुटमनि राधिके, जै नव नीरज नैन।।

स्तोत्र
जयति जय राधा रसिकमनि मुकुट मन-हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 1 ।।
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 2 ।।
जयति रति रस वर्द्धनी अति अद्भुता सदया हिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 3 ।।
जयति आनंद कंदनी जगबंदनी बर बदनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 4 ।।
जयति स्यामा अमित नामा वेद बिधि निर्वाचिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 5 ।।
जयति रास-बिलासिनी कल कला कोटि प्रकाशिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 6 ।।
जयति बिबिध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 7 ।।
जयति चंचल चारु लोचनि दिव्य दुकुला भरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 8 ।।
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 9 ।।
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 10 ।।
जयति बल्लभ बल्लभा आनंद कलभा तरुनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 11 ।।
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 12 ।।
जयति नौतन नित्य लीला नित्य धाम निवासिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 13 ।।
जयति गुण माधूर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 14 ।।
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 15 ।।
जयति जस जग प्रचुर परिकर हरिप्रिया जीवनि जिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 16 ।।


दोहा
नव-नव रंगि त्रिभंगि जै, स्याम सुअंगी स्याम।
जै राधे जै हरिप्रिये, श्री राधे सुख धाम।।

स्तोत्र
जै राधे जै राधे राधे जै राधे जै श्री राधे।
जै कृष्ण जै कृष्ण कृष्ण जै कृष्ण जै श्री कृष्ण। 1 ।
स्याम गोरी नित्य किसोरी प्रीतम जोरी श्री राधे।
रसिक रसीलो छैल छबीलो गुन गरबीलो श्री कृष्ण। 2 ।
रासविहारनि रसबिसतारनि पिय उर धारनि श्री राधे।
नव-नव रंगी नवल त्रिभंगी स्याम सुअंगी श्री कृष्ण। 3 ।
प्रान पियारी रूप उज्यारी अति सुकुंमारी श्री राधे।
मैंन मनोहर महा मोदकर सुंदर बर तर श्री कृष्ण। 4 ।
सोभा सेंनी मोहा मेंनी कोकिल बेंनी श्री राधे।
कीरतिवंता कामिनिकंता श्री भगवंता श्री कृष्ण। 5 ।
चंदा-वदनी कुंदा रदनी सोभा सदनी श्री राधे।
परम उदारा प्रभा अपारा अति सुकुंवारा श्री कृष्ण। 6 ।
हंसागवनी राजति रवनी क्रीड़ा कवनी श्री राधे।
रूपा रसाला नैंन बिसाला परम कृपाला श्री कृष्ण। 7 ।
कंचनबेली रति रस रेली अति अलबेली श्री राधे।
सब सुख सागर सब गुन आगर रूप उजागर श्री कृष्ण। 8 ।
रवनी रम्या तर तर तम्या गुण आगम्या श्री राधे।
धाम निवासी प्रभा प्रकासी सहज सुहासी श्री कृष्ण। 9 ।
शक्तयाह्लादनि अति प्रियवादनि उर उन्मादनि श्री राधे।
अंग अंग टोना सरस सलोना सुभग सुठोना श्री कृष्ण। 10 ।
राधा नामिनि गुण अभिरामिनि हरिप्रिया स्वामिनि श्री राधे।
हरे हरे हरि हरे हरे हरि हरे हरे हरि श्री कृष्ण। 11 ।

अंत में: गोविंद जय जय गोपाल जय जय, राधारमण हरि गोविंद जय जय।

निम्बार्की हरिव्यासी परंपरा में विशेष

  • इष्टदेव: सर्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण
  • कुलदेव: रुक्मिणी माता
  • शाखा: हंस
  • आचार्य: सनकादि
  • मुनि: नारद
  • वेद: सामवेद
  • आहार: हरिनाम
  • अखाड़ा: निर्मोही
  • देवता: गरुड़
  • धाम: बद्रिकाश्रम
  • माला: तुलसी
  • तिलक: हरि मंदिर श्याम बिंदी
  • द्वारा: स्वयंभूराम (शोभूराम)
  • गोत्र: अच्युत
  • गोपाल मंत्र: क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा:
  • संकीर्तन: राधे कृष्ण राधे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण राधे राधे, राधे श्याम राधे श्याम, श्याम श्याम राधे राधे।

मंदिर की उपासना व दीक्षा पद्धति

निम्बार्क संप्रदाय में अकेले श्रीकृष्ण की उपसना नहीं होती बल्कि राधा-कृष्ण की युगल उपासना होती है।

निम्बार्क संप्रदाय में पंच संस्कार का विधान है-गोपीचंदन का मस्तक पर ऊर्ध्वपुंड्र तिलक, भुजाओं पर शंख-चक्र, गुरुदेव द्वारा भगवत संबंधी नामकरण, गले में तुलसी की कंठी और मंत्रोपदेश। इन पांच संस्कारों से व्यक्ति में वैष्णवत्व आता है।

पहला संस्कार- तिलक लगाने का विधान: गोपीचंदन (यदि भेंट द्वारिका के पास गोपी तालाब से उपलब्ध है तो सर्वोत्तम) को हथेली में जल के साथ घिसकर मस्तक (ललाट) पर ऊर्ध्वपुंड्र तिलक लगाने का विधान है। भस्म से तिलक लगाना निषेध है लेकिन ब्रज रज का इस्तेमाल कर सकते हैं। नासिका के तीन भाग में से दो भाग छोड़कर तीसरे भाग से तिलक शुरू करें और ललाट के अंत में केशों तक ले जाएं, दो रेखाओं के बीच में एक अंगुल से कम स्थान न हो बल्कि कुछ ज्यादा हो और ऊपर की ओर चौड़ाई लगातार बढ़ती जाए। रेखाएं चावल की मोटाई जितनी हों। तिलक की आकृति हरिचरणारविंद के समान हो। निम्बार्की तिलक हरिपादाकृति कहलाता है। इसे हरि मंदिर भी कहते हैं। तिलक के बीच दोनों भोहों के मध्य में श्यामश्री (यदि जगन्नाथपुरी के पास कज्जलगिरी या गोवर्धन की तलहटी में राधाकुंड का श्यामश्री उपलब्ध हो तो उत्तम) से एक छोटा सा गोल श्यामबिंदु (काला बिंदी) लगाएं। शरीर पर द्वादश तिलक लगाने का विधान है, ये स्थान हैं- ललाट, पेट, वक्षस्थल, कंठ, दक्षिणी कांख, दक्षिणी भुजा, दक्षिणी कंधा, बांयीं कांख, बांयी भुजा, बांया कंधा, पीठ व कमर पर। [21]

दूसरा संस्कार- भुजाओं पर शंख-चक्र: भगवान के आयुध चिह्नों को भी गोपीचंदन से अंकित करें। दक्षिणी बाहु पर चक्र और वाम बाहु में शंख धारण करना चाहिए। इन दिनों कुछ वैष्णव अपनी बांहों पर शंख-चक्र के स्थायी गोदना गुदवाने लगे हैं।

तीसरा संस्कार- कंठी माला: आचार्य (गुरुदेव) से प्राप्त कंठी माला भगवान का दासत्व स्वीकार करने का प्रतीक है। शास्त्रों में वैष्णवों द्वारा कंठी धारण न करना अपराध की श्रेणी में गिना गया है। कंठी को गले से किसी भी परिस्थिति (अशौच व अनाचार अवस्था) में नहीं उतरना चाहिए। निम्बार्क संप्रदाय में युगलोपासना है, इसलिए कंठी को दोहरा (दो लड़ियां) पहनने की परंपरा है। कंठी उपास्य विग्रह के श्रीअंग से स्पर्श करके और गुरुदेव आचार्य से अभिमंत्रित ही पहननी चाहिए।

चौथा संस्कार- गुरु द्वारा नामकरण: यदि पूर्व नाम यानी मौजूदा नाम भगवत संबंधी नहीं है तो गुरुदेव नया नामकरण करते हैं। नए नाम में भगवान के विविध नामों के साथ दास, शरण, प्रपन्न (किशोरी जी के अनन्य उपासकों के नामों में दासी, सखी व आली) आदि जोड़े जाते हैं।

पांचवां संस्कार- मंत्रोपदेश: गुरुदीक्षा पंच संस्कारों में सर्वोपरि महत्ता का संस्कार है। संप्रदाय में दो मंत्र देने की परंपरा है, पहला शरणागति मंत्र और दूसरा श्रीगोपाल मंत्र। पहला मंत्र नारद पांचरात्र से है, दूसरा अष्टादशाक्षर मंत्र अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा के गोपाल तापिनी उपनिषद का है। [22]

वैष्णव समाज गायन

कार्तिक मास में निम्बार्क कोट में हर शाम को होने वाला समाज गायन निबार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव का विशेष आकर्षण है। बताते हैं कि निम्बार्क संप्रदाय में विक्रम संवत की पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के मध्य से ही समाज गायन की परंपरा चली आ रही है। वहीं निबार्क कोट में समाज गायन की परंपरा का इतिहास लगभग 180 साल से कुछ अधिक अधिक पुराना है। यहां की समाज गायन परंपरा का श्रीगणेश स्वामी गोपाल दास जी महाराज ने विक्रम संवत् 1901 (ईस्वी सन् 1843) में तब किया था, जब उन्होंने श्री निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव की स्थापना की। तब से यहां महोत्सव में समाज गायन की परंपरा अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
निम्बार्क कोट में समाज गायन

समाज गायन प्राचीन भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायन की एक वैष्णवी शैली है, जिसमें संत समूह में मिलकर आचार्यों की वाणी पदों का गायन करते हैं। रसिक संतों व आचार्यों द्वारा राधाकृष्ण के युगल स्वरूप की दिव्य लीलाओं की जो काव्यमय अभिव्यक्ति है, वही वाणी है और इन वाणियों का सामूहिक गायन ही समाज गान है।

समाज गायन के समय सभी साधु संत दो दलों में विभक्त होकर दो पंक्तियों में आमने-सामने बैठते हैं। दोनों पंक्तियां अपने सेव्य विग्रह के सामने दांयी और बांयी ओर होती है। दाहिनी ओर वाले दल को मुखिया दल और बांयी ओर वाले दल को झेला दल कहते हैं। मुखिया दल के सबसे निपुण कलाकार को मुखिया पुकारा जाता है। मुखिया पहले तानपूरा लेकर बैठते थे पर आजकल हारमोनियम के इस्तेमाल करने का चलन हो गया है। उनके अगल-बगल में कई अन्य श्रेष्ठ साधु-संत कुछ अन्य वाद्य जैसे सारंगी, सितार, तानपूरा, बांसुरी आदि लेकर बैठते हैं। सेव्य विग्रह के बांयी ओर झेला दल में एक या अधिक संत झांझ या मजीरा आदि बजाते हैं। दोनों पंतियों के मध्य में रिक्त स्थान पर अंतिम छोर पर मृदंग वादक बैठता है, जो सेव्य विग्रह के बिल्कुल समुख होता है। दोनों दलों के मध्य ऊंची चौकी पर रखी वाणी को समाज श्रंखला के नाम से जाना जाता है। अन्य समाजियों के समाने भी ऊंची चौकी पर अथवा रेहल पर वाणी की प्रतिलिपियां रखी होती हैं। जो पहले हस्तलिखित हुआ करती थी पर आजकल मुद्रित भी होती हैं।

परंपरागत रूप से सर्वप्रथम मुखिया व अन्य एक दो वरिष्ठ संत समाज का शुभारंभ करते हैं। सर्वप्रथम मंगलाचरण के रूप में मंगल के दो पद गाए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-छोटा मंगल व बडा मंगल। बडा मंगल पहले गाया जाता है, जो सूहा विलावल में गाया जाता है। इस बडे मंगल में तद्तद् आचार्य का उत्कर्ष गाया जाता है। जबकि बाद में गाया जाने वाला छोटा मंगल प्रणामात्मक व मंगल सूचक होता है।

समाज के आरंभ में होने पर कुछ समय पश्चात पुजारी बाबा द्वारा वाणी जी व अन्य समाजियों का माला, चंदन इत्र इत्यादि से आदर सत्कार किया जाता है। वह समाजियों को गायन के मध्य में ही मिश्री, काली मिर्च, पान-बीरी, इलाइची आदि का भोग देते हैं। मंगल के दोनों पदों के गायन के उपरांत श्रीभट्ट जी की रचना युगल शतक से किसी एक पद का गायन होता है। युगल शतक में 100 पद हैं। फिर श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी की रचना महावाणी से एक पद गाया जाता है। फिर आचार्यों की बधाइयां हंसवंश यश सागर व अन्य बधाई की पुस्तकों के पदों द्वारा गाई जाती हैं।

निबार्क संप्रदाय की समाज गायन में मुख्य रूप से सूहा विलावल, यमन कल्याण, श्याम कल्याण, देव गंधार, काफी, मल्हार, बिहाग, भूपाली, मालकौश, केदार, बहार, भीमपलासी, सोरठ, सिहानो, पीलू मारू, वृंदावनी सारंग, आसावरी, भैरवी, देश, भैरव, रामकली, चैती गौरी, धनाी, खमाज, वरवा, खट, वागेश्र्वरी, अडाना, विहागडा व दरवारी आदि रागों का प्रयोग किया जाता है। तालों में प्रमुख रूप से चौताल (ध्रुपद), चर्चरी, झप, तीन ताल, कहरवा, दादरा, रूपक, दीपचंदी आदि का प्रयोग होता है। समाज गायन में गाए जाने वाले पद का प्रस्तुतिकरण दो प्रकार की लय में किया जाता है। पद को विलंबित लय में शुरू करके द्रुत लय में ले जाते हैं।

निम्बार्क संप्रदाय में मुखिया व झेला का क्रम कब से चला आ रहा है, यह तो शोध का विष्य है किंतु निबार्क कोट में समाज गायन में मुखियाओं की परंपरा इस प्रकार रही है- श्रीरमन दास, गोपाल दास, गोकुल दास, पूरन दास, प्रेमदास, गोविंद दास, रूप किशोर दास, रसिक दास व वृंदावन बिहारी, अलबेली शरण, प्रेमदास व गोपालजी।

निम्बार्क कोट घराने की समाज गायन के वर्तमान मुखिया वृंदावन बिहारी के मुताबिक दंडक गायन इस घराने की विशेष शैली है। दंडक का अर्थ है दंड के समान लंबा। झप ताल में गाए जाने वाली इस शैली में कवित्त आदि छंदों की लंबी-लंबी पंक्तियों का प्रयोग होता है। यह निम्बार्क कोट के समाज गायन के अंतर्गत कार्तिक शुक्ल दशवीं व एकादशी को यहां गाया जाता है। कार्तिक कृष्ण षष्ठी को चलसखी का गायन, कार्तिक कृष्ण पंचमी को सहज सुन सजनी गायन, सप्तमी का श्रीजी की बधाई और अष्टमी को ठाकुरजी (लालजी) की बधाई कार्तिक कृष्ण द्वादशी व पूर्णिमा को हेली गायन सुनकर कोई भी श्रोता मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।

वृन्दावन बिहारी के मुताबिक समाज गायन की मूलधारा श्रद्धा व उपासना पर आधारित है। यह किसी राजा इत्यादि के सामने गाए जाने वाली मनोरंजन प्रधान गायकी नहीं है। उन्होंने कहा कि अमूमन समाज गायन के लिए राग के ज्ञान की नहीं अनुराग मय ध्यान की आवश्यकता है। वस्तुत: जिस समय एकाग्र मन से संत जन गाने लगते हैं तो सारा वातावरण ही दिव्य हो जाता है। समाज गायन ब्रज की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।

महावाणी की हस्तलिखित प्रति

निम्बार्क कोट में 'महावाणी' की एक हस्तलिखित प्रति उपलब्ध है, जो संवत 1824 में रूपनगर में जोशी मोतीराम द्वारा लिखी गई थी। यह वृंदावन में प्राप्त महावाणी की सबसे पुरानी प्रतियों में से एक है।[28]

निम्बार्क कोट मंदिर की आचार्य परंपरा

  1. हंस भगवान व सनकादिक: हंस भगवान निम्बार्क संप्रदाय के आद्य आचार्य हैं, जो विष्णु के अवतार माने जाते हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा के मानस पुत्रों (सनकादिकों-सनक, सनंदन, सनातन व सनत कुमार) को सृष्टि से विरक्त कर भगवत चिंतन की ओर मोड़ने के लिए भगवान ने हंस रूप धारण किया था।
  2. नारद भगवान: पौराणिक कथाओं में नारद को अनेक युग पुरुषों (ध्रुव, प्रह्लाद, वेदव्यास, निम्बार्काचार्य) का गुरु माना गया है।
  3. निम्बार्काचार्य: राधाकृष्ण की युगलोपासना के प्रणेता। इनका जन्म मूंगी पैठण (महाराष्ट्र) में हुआ था। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर 'वेदांत पारिजात सौरभ' टीका लिखी और 'द्वैताद्वैत' या 'भेदाभेद' दर्शन प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में वेदांत कामधेनु, दशश्लोकी, गीता वाक्यार्थ, मंत्र रहस्य षोडशी, प्रपन्न कल्प वल्ली, प्रपत्ति चिंतामणि, कृष्ण स्तवराज, श्रीराधाष्टक, सदाचार प्रकाश और प्रात: स्मरण स्तोत्र शामिल हैं। संप्रदाय की मान्यताओं के अनुसार इन्हें सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है। अनुयायी ऐसा मानते हैं कि निम्बार्क भगवान सुदर्शन चक्र सहित 8 रुपों में विराजमान हैं-भगवान विष्णु के चार आयुधों में से एक सुदर्शन चक्र के रूप में, कृष्णावतार के चतुर्व्यूह में अनिरुद्ध के रूप में, कृष्ण सखाओं में तोष के रूप में, श्रीराधा की अष्टसखियों में रंगदेवी सखी के रूप में, कलियुग में निम्बार्काचार्य के रूप में, गोलोक के श्रीवृंदावन नित्यनिकुंज में प्रिया-प्रीतम की अंगकांति के रूप में, गोचारण के दौरान ठाकुरजी द्वारा इस्तेमाल की गई लकुटी के रूप में और कृष्ण की गउओं में धूसर गाय के रूप में।
  4. निवासाचार्य: निम्बार्काचार्य के पट्‌ट शिष्य, जिन्हें पांचजन्य शंख का अवतार माना जाता है। इन्होंने 'वेदांत कौस्तुभ' की रचना की।
  5. विश्वाचार्य: निवासाचार्य के शिष्य। किंवदंतियों के अनुसार, निवासाचार्य ने इनसे 11 दार्शनिक प्रश्न किए थे, जिनके उत्तर के बाद वे उनके शिष्य बन गए।
  6. पुरुषोत्तामाचार्य
  7. विलासाचार्य
  8. स्वरूपाचार्य
  9. माधवाचार्य
  10. बलभद्राचार्य
  11. पद्माचार्य
  12. श्यामाचार्य
  13. गोपालाचार्य
  14. कृपाचार्य
  15. देवाचार्य : आपने वेदांत सिद्धांत जाह्नवी की रचना की।
  16. सुंदर भट्ट : आपने सिद्धांत सेतुका की रचना की।
  17. पद्मनाभ भट्ट देवाचार्य
  18. उपेंद्र भट्ट देवाचार्य
  19. रामचंद्र भट्ट देवाचार्य
  20. वामन भट्ट देवाचार्य
  21. कृष्णभट्ट देवाचार्य
  22. पद्माकर भट्ट देवाचार्य
  23. वाण भट्ट देवाचार्य
  24. भूरि भट्ट देवाचार्य
  25. माधव भट्ट देवाचार्य
  26. श्याम भट्ट देवाचार्य
  27. गोपाल भट्ट देवाचार्य
  28. बलभद्र भट्ट देवाचार्य
  29. गोपीनाथ भट्ट देवाचार्य
  30. केशव भट्ट देवाचार्य
  31. गांगल भट्ट देवाचार्य
  32. केशव काश्मीरी भट्‌टाचार्य: निम्बार्क परंपरा में 30वें आचार्य। इन्होंने कश्मीर में 'कौस्तुभ प्रभा' और 'क्रम दीपिका' जैसे ग्रंथ लिखे।
  33. श्रीभट्ट देवाचार्य: 'युगल शतक' के रचयिता।
  34. हरिव्यास देवाचार्य: 'महावाणी' के प्रणेता।
  35. स्वयंभूराम देवाचार्य: निम्बार्क कोट के द्वाराचार्य। हरिव्यास देवाचार्य के 12 प्रधान शिष्यों में सबसे वरिष्ठ।
  36. कर्णहर देव
  37. नारायण देव
  38. हरिदेव
  39. श्याम देव
  40. श्याम दामोदर देव
  41. श्रुति देव
  42. सहजराम देव
  43. रामदेव
  44. ज्ञानदेव
  45. वृंदावन देव
  46. रामशरण देव
  47. धर्म देव
  48. सेवादास
  49. बाबा गोपालदास महाराज: सेवादास के शिष्य, जिन्होंने 1843 में वृंदावन में निम्बार्क महोत्सव प्रारंभ किया और 'उत्सवी बाबा' के नाम से विख्यात हुए।[29]
  50. बाबा हंसदास: गोपालदास के शिष्य। 1895 से 1937 तक निम्बार्क जयंती उत्सव का संचालन किया।
  51. बाबा बाल गोविंद दास: हंसदास के विरक्त शिष्य, जिन्होंने निम्बार्क कोट का निर्माण कराया।
  52. हरिदास श्रृंगारी: बालगोविंद दास के छोटे भाई, जो 18 वर्ष की आयु में वृंदावन आ गए थे। राधारमण लालजी की अष्टयाम सेवा में समर्पित रहे।
  53. माता श्याम प्यारी: हरिदास श्रृंगारी की धर्मपत्नी। 1950 से 1983 तक निम्बार्क कोट का संचालन किया।
  54. वृंदावन बिहारी: हरिदास श्रृंगारी के पुत्र। वर्तमान में निम्बार्क कोट के सेवायत।

वृंदावन बिहारी

श्री वृंदावन बिहारी शर्मा (आयु 88 वर्ष) वर्तमान में निम्बार्क कोट के व्यवस्थापक और सेवायत हैं। वे 14-15 वर्ष की आयु से ही मंदिर की परंपराओं का संचालन कर रहे हैं। समाज गायन, नित्य रासलीला और हस्तलिखित साहित्य के संरक्षण में उनका विशेष योगदान रहा है। उन्होंने अपने पैतृक मंदिर में एक मासीय निम्बार्क जयंती आयोजन में समाज गायन की प्राचीन शैली और रासलीलाओं के क्रम को व्यवस्थित किया।

यह मंदिर वृंदावन में निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव के आयोजन के लिए विख्यात है जो कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) में पूरे महीने मनाया जाता है। यह महोत्सव 182 वर्ष (सन् 1843) से अधिक वर्षों से वृंदावन में आयोजित होता है। इस महोत्सव की विशेषता है इसमें दैनिक होने वाला समाज गायन और नित्य रासलीला। समाज गायन ब्रज के भक्त कवियों की पद रचनाओं का शास्त्रीय व लोक शैली में सामूहिक गायन है। नित्य रासलीला ब्रज के भक्तों की रचित श्रीकृष्ण की किशोर लीलाएं हैं, इन लीलाओं का मंचन अब केवल निम्बार्क कोट में ही होता है। समाज गायन व नित्य रासलीला ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर है, इस महोत्सव के आयोजन के जरिए इनका संरक्षण हो रहा है। समाज गायन सदियों से ब्रज के मंदिरों में होता है, ब्रज में मौजूद सभी वैष्णव संप्रदायों की अपनी शैलियां हैं लेकिन निम्बार्क संप्रदाय के समाज गायन ने सभी शैलियों में एक विशेष दर्जा हासिल किया है तो यह केवल वृंदावन बिहारी जी का निजी प्रयास है। उन्होंंने अपने पैतृक मंदिर में एक मासीय निम्बार्क जयंती आयोजन में हर दिन न सिर्फ समाज गायन में कौन-सा पद, किस राग व शैली में गाया जाए, बल्कि रास लीलाओं के क्रम को भी तय किया ताकि प्राचीन शैली व परंपरा ही बरकरार रहे। वे स्वयं समाज गायन के अच्छे गायक और समाज गायन के साधु-संतों की टोली के मुखिया हैं। आज भी दो घंटे तक गाए जाने वाले लंबे पदों को ठाकुरजी के सामने गाते हैं। उनकी गायन शैली इतनी असरदार है कि समाज गायन से अनजान व्यक्ति भी उसे सुनकर बिना किसी योगक्रिया के एकाग्रचित्त व शांत मन:स्थिति में पहुुंच जाए। उन्होंने उत्सव के दौरान उन नित्य रासलीलाओं के मंचन को प्रोत्साहित किया जिनका मंचन अब ब्रज में भी कहीं नहीं होता है। विशेष बात यह है कि इसके लिए उन्होंने किसी सरकारी या निजी संस्था से कभी मदद नहीं ली बल्कि स्वयं श्रीमद्भागवत के कथावाचन के परिश्रम से धन एकत्र कर सभी संचालन किया। उन्हें संस्कृत में आचार्य और दर्शनशास्त्र में एमए की उपाधि हासिल है।
ब्रज के संतों, विद्वानों का उन्हें विशेष स्नेह मिला। पिता श्रृंगारी जी तब परमधाम चले गए जब इनकी उम्र महज 13 साल थी। महज 10 दिन की आयु में ही बाबा हंसदास जी इन्हें गोद में रखकर कंठी बांधी। बाबा बालगोविंद दास जी से आपने निम्बार्क संप्रदाय की दीक्षा ली। टटिया स्थान के बाबा श्री राधा चरण दास जी महाराज ने इन्हें सदा पुत्रवत दुलार दिया। भागवत के मर्मज्ञ व शालीन वक्ता पं. रामानुचार्य जी (सेवा कुंज की गली में) से उन्होंने भागवत कथा की शिक्षा ली। अपने गुरुदेव व परमगुरुदेव की भांति ही निम्बार्क निष्ठ होते हुए भी इनकी सभी संप्रदायों व उनके आचार्य, महात्माओं के प्रति अपार आस्था व सम्मान है। इनके सरल, सहज, निश्छल, निर्मल, निस्पृह व उदार स्वभाव के चलते निम्बार्क कोट में न केवल निम्बार्की बल्कि हरिदासी, गौड़िया, रामानंदी, रामानुजी, राधा बल्लभी और बल्लभकुली सभी संप्रदायों के साधु-संतों, महात्माओं, महंतों व विद्वानों का अपने घर-मंदिर के तरह आना-जाना बना रहता हैं।
70 के दशक में वृंदावन में ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण के लिए शोध संस्थान की स्थापना हुई तो इन्होंने उसमें कैटलॉग तैयार करने की जिम्मेदारी ली ताकि उन्हें ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों को पढ़ने का मौका मिलता रहे। सामान्य कैटलॉगिंग से कहीं बढ़कर इन्होंने अनेक विशिष्ट मानक तय करके ग्रंथों की संक्षिप्त विवरण तैयार किया। यह ग्रंथ ब्रज, संस्कृत, हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी व उर्दू आदि भाषाओं में हैं। इन्होंने वृंदावन के तमाम मंदिरों को भी इस बात सहमत कराया कि उनके पास जो भी हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं उन्हें वृंदावन शोध संस्थान में दान कर दें ताकि वे वहां भविष्य के लिए वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित रह सकें और आने वाली पीढ़ियों को उपलब्ध हों। शोध संस्थान में काम करने के दौरान इन्होंने करीब 25 वर्षों के दौरान हजारों हस्तलिखित ग्रंथों का अध्ययन करके हिंदी व अंग्रेजी में एक दर्जन कैटलॉग तैयार किए जो संस्थान की एक विशेष पूंजी है क्योंकि देश के किसी भी हस्तलिखित संग्रहालय में ऐसा ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, यमुना के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय देते हुए न केवल बल्लभाचार्य व अन्य संतों की भांति स्वयं का एक यमुनाष्टक लिखा बल्कि अब तक उपलब्ध सभी यमुनाष्टकों का एकत्र करके उन्होंने यमुना के संरक्षण पर शोधपरक पुस्तक ‘यमुना एवं यमुनाष्टक’ लिखी है। इसमें यमुना के प्रदूषण दूर करने के लिए इसकी अविरल निर्मल धारा को बनाए रखने की सरकार से अपील की है। दिल्ली व आगरा के विश्वविद्यालयों से लेकर वृंदावन व आसपास के इलाकों के हिंदी, संस्कृत, ब्रज भाषा व दर्शनशास्त्र पीएचडी शोधार्थी इनके पास मार्गदर्शन के लिए आते रहते हैं। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व तमाम एशियाई देशों के विदेशी जिज्ञासु पर्यटक भी इनके पास अपने प्रश्नों के समाधान के लिए मिलने आते रहते हैं। वृंदावन की विद्वत गोष्ठियों-सम्मेलनों में इन्हें विशेष रूप से भाषण के लिए आमंत्रित किया जाता है, हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश व अन्य कई भाषाओं में समान पकड़ होने के चलते उद्धरण व आख्यानो से भरमार इनका प्रभावशाली धाराप्रवाह भाषण इनकी विशिष्ट पहचान है। इन्हें ब्रज के अनेक सम्मानों व उपाधियों से नवाजा गया है। अपनी बेहद सादी वेशभूषा (धोती-बगलबंदी) व सत्यनिष्ठ, मृदु, विनम्र, करुणामयी, किसी की भी मदद के लिए सदैव तैयार वयोवृद्ध वृंदावन बिहारी जी ब्रज की विभूति व निधि हैं।
उनके लिखे गए दो पद आज भी समाज गायन के अंत में गाए जाते हैं:

पहला पद:
सेवों श्री राधा रमण उदार।
जिन श्री गोपाल दास जू सेव्यो, गोपाल रूप उर धार।
श्री हंस दास जू सेवत मानसी, युगल रूप उर सार।
तिनकी कृपा श्री गोविंद बाल जू, दिए सिंहासन बैठार।।

दूसरा पद:
जै जै श्री राधा रमण विराजै।
निज लावण्य रूप निधि संग लिए, कोटि काम छवि लाजैं।
कुंज कुंज मिल बिलसत हुलसत, सेवत सहचरि संग समाजैं।
श्री वृंदावन श्री हितु श्री हरिप्रिया, चोज मनोजन काजैं।।

सन्दर्भ

  1. "निम्बार्क पीठ के व्रतोत्सव निर्णय में कार्तिक-मार्गशीष मास". Archive.org.
  2. "संत सेक्शन में निम्बार्क कोट का उल्लेख". Nimbark Social Welfare.
  3. बाबा राजेंद्र दास जी महाराज निम्बार्क कोट में मौजूद तुलसीदास जी के लोटे का प्रसंग (Video). Facebook.
  4. निम्बार्क कोट शताब्दी वर्ष समारोह संपन्न:अक्षय तृतीया पर सर्वांग अभिषेक हुआ, फूलबंगले में विराजे राधारमण लाल,एक वर्ष से चल रहा था शताब्दी वर्ष महोत्सव, 20 अप्रैल, 2026 को दैनिक भास्कर न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित https://www.bhaskar.com/local/uttar-pradesh/mathura/news/vrindavan-nimbark-kot-shatabdi-mahotsav-sampann-akshay-tritiya-utsav-137745038.html
  5. प्रभुदायल मीतल (1968). ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास (PDF). p. 550.
  6. अनुरागी महाराज (2009). ब्रजमंडल परिक्रमा. pp. 278–279.
  7. श्री हंसदास जी एवं गोपाली बाई जी का चरित्र - भक्तमाल कथा. YouTube.
  8. बाबा हंसदास. राधा रहस्य प्रकाशिका.
  9. बाबा हंसदास. निम्बार्क प्रभा.
  10. नारायण दत्त शर्मा (1964). निम्बार्क संप्रदाय और उसके कृष्ण भक्त हिंदी कवि.
  11. Nimbarka Sampradaya. Shree Nimbarka Madhuri.
  12. अवध बिहारी लाल कपूर. ब्रज के भक्त (भाग-2) (PDF).
  13. Anand, D. (1992). Krishna: The Living God of Braj (अंग्रेज़ी भाषा में). Abhinav Publications. ISBN 978-81-7017-280-2.
  14. "निम्बार्क संप्रदाय का मूक साक्षी है वृंदावन का निम्बार्क कोट मंदिर". Blogspot Archives.
  15. "Demonetisation: Donations dry up at temples, dargahs". The Indian Express. 2016.
  16. "छीपी गली का निम्बार्क कोट मंदिर". Vrindavan Today.
  17. IAVRI Bulletin, Issue 1-12. International Association of the Vrindavan Research Institute. 1975.
  18. निम्बार्क कोट में दीपावली को होने वाली चौसर लीला. YouTube.
  19. "Nimbarka Acharya-Vrinda Jayanti Mahotsava". A108.net International Vaishnavas Portal. मूल से से 14 अप्रैल 2021 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 17 मार्च 2026.
  20. पंगत की धुन सुनाते बाबा राजेंद्र दास. YouTube.
  21. (डॉ) प्रभाकर शास्त्री, प्रो. (2002). "भगवन्निम्बार्काचार्य  : सिद्धांत, उपासना एवं आचार्य-परंपरा" (PDF). NimbarkSocialWelfare.
  22. शास्त्री, प्रो. (डॉ) प्रभाकर (2002). भगवन्निम्बार्काचार्य : सिद्धांत, उपासना एवं आचार्य परंपरा. भारत: रचना प्रकाशन, जयपुर. pp. पेज-142 से 160. ISBN 81-86116-96-6.
  23. "डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की बदौलत हो रहा ब्रज संगीत का सुखद पुनरुद्धार". Devdiscourse.
  24. युगल शतक. श्रीजी कुंज.
  25. महावाणी.
  26. हंसवंश यश सागर (PDF).
  27. विजयेंद्र स्नातक, राकेशबाला सक्सेना (1990). मध्ययुगीन वैष्णव संप्रदायों में संगीत.
  28. राजेंद्र प्रसाद गौतम (1974). हरिव्यास देवाचार्य एवं महावाणी. pp. 80–81.
  29. मेरो वृंदावन चैनल पर निम्बार्क कोट के दर्शन. Facebook.
  30. वृंदावन बिहारी (1990). यमुना एवं यमुनाष्टक.
  31. "वृंदावन शोध संस्थान की प्रकाशन सूची".